Saturday, 25 July 2015

अधूरा रह गया...

मैं अपनी कविता के बिना अधूरा रह गया
मेरी कविताओं के कई सवाल थे
उन सवालों का जवाब अधूरा रह गया

मैं, जो आस अब तक लगाए  बैठा था
वो आस अधूरा रह गया
मेरा सारा प्रयाश अधूरा रह गया

मेरे सारे ख्वाब जो मैंने 
अपनी कविता के लिए देखे थे
वो ख्वाब अधूरा रह गया 

शायद, मेरी कहानी की 
शुरुआत ही अच्छी नहीं हुई
इसलिए अच्छा अंत अधूरा रह गया

मैं अपनी कविता के लिए 
और भी कविताएँ लिखना चाहता था
पर कविता के बिना, कविताओं का दौर अधूरा रह गया

मैं हर बार थोड़े से रह जाता था
इस बार, उस थोड़े में भी अधूरा रह गया
अन्ततः, अपनी कविता के बिना अधूरा रह गया

*राकेश वर्मा*

जरिया बन गई...

वो मेरी कविता तो न बन पाई
पर मेरी इन कविताओं का 
जरिया जरुर बन गई

वो मंजिल जिसकी तलाश थी
वो मंजिल तो न मिल पाई
पर एक नई शुरुआत करने का
जरिया जरुर बन गई

जहाँ से कहानी की शुरुआत हुई
वो खत्म भी  वहीं हो गई
तो कहानी अंत करने का 
जरिया जरुर बन गई

मैंने कोई गलती नहीं की, 
पर गलतफहमी जरुर हुई
इस गलतफहमी को दूर करने का
जरिया जरुर बन गई

थोड़े पल के लिए 
वो मेरे जीवन का एक हिस्सा बन गई
और बखूबी मेरा साथ निभाने का
जरिया जरुर बन गई

अब जो हूँ मैं, मुझसे इसकी 
कल्पना भी न हुई
वो मेरे इस अनुभव और प्रेरणा का
जरिया जरुर बन गई

मेरा ये दौर बहुत लंबा नहीं था
इस छोटे दौर में ही बहुत कुछ सीखा गई
मगर इस छोटे से सफर का
हमसफर जरुर बन गई

*राकेश वर्मा*