Friday, 24 July 2015

बेहतर कौन ?

क्यों न मैं, तुम्हें खुद से बेहतर बताऊँ
और खुद ही तुमसे दूर हो जाऊँ
जिससे तुम्हें अपने फैसले पर अफसोस न हो
क्योंकि मेरी खुशी तो तुम्हारी खुशी में ही है

इसलिए मैं आईने के सामने खड़ा हो जाता
और खुद को अहसास दिलाता
खुद को तुमसे कम,
तुमको खुद से बेहतर बताता

निर्णय लेना तो बहुत मुश्किल होता
कि बेहतर कौन?
पर क्या करता!
खुद को तुमसे दूर जो करना था

अगर खुद को बेहतर बताता 
तो खुद पर घमंड हो जाता 
ये घमंड एक दिन खुद ही टूट जाता
या इसे तोड़ने को मैं मजबूर हो जाता

इसलिए हर बार तुम्हें जीताता 
और खुद हार जाता
हर बार तुम्हीं को बेहतर बताता
और खुद पीछे हट जाता

एक फैसला तुम पर भी छोड़ता हूँ
क्या ऐसा करके मैंने सही किया?

*राकेश वर्मा*

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