Friday, 24 July 2015

वक्त की साजिश...

कभी उनसे मिलने के लिए
कई लम्हा इंतज़ार किया करते थे
पर आज वो खुद ही 
हमारे पास चले आए
तो शायद ये वक्त की ही साजिश थी

कभी उनसे बात करने के लिए
कितना तरसता था, बेकरारी थी
पर आज वो खुद ही
हमसे बात करने लगे
तो शायद ये वक्त की ही साजिश थी

कभी अधूरे ख्वाब को पूरा करने के लिए
सोचा करते थे कि उन्हें कैसे बताएं
पर आज वो खुद ही 
हमारे दिल की बात समझ गए
तो शायद ये वक्त की ही साजिश थी

पर आज भी दिल के अरमां
दिल में ही है
इंतजार कर रहा हूँ
अगर किसी दिन ये अरमां पूरे हो जाएँ
तो शायद ये वक्त की ही साजिश होगी

*राकेश वर्मा*

No comments:

Post a Comment

Happy to hear from you