Friday, 24 July 2015

हकीकत क्या है?

मैं आज भी असमंजस में हूँ
वो मुझसे प्यार करती है या नहीं
तो मैंने उसके जुबाँ से
जानने की कोशिश की

वो सीधे मना न कर सकी
ताकि मुझे दुख न हो 
तो मैंने भी उसे बाध्य नहीं किया बताने को
ताकि उसे भी आहत न हो

जब वो सीधे सीधे मना न कर पाई
जब ढ़ेर सारे बहानों की लाइन लगाई
तो क्या मैं समझ न पाया 
कि उसके दिल में क्या था?
समझ तो मैं पहले ही गया था
पर मैंने एक कोशिश करना चाहा
उसके सारे दिक्कतों का हल बताया
फिर भी वो जवाब न दे पाई
और मेरी कोशिश, कोशिश बनकर रह गई

मैंने तो उसे अपना पूरा दिल ही दे दिया था
उससे तो उसके दिल में बस थोड़ी सी जगह माँगी थी
पर शायद उसका दिल ही छोटा निकला
या हो सकता है उसके दिल में
किसी और ने जगह बना रखी हो
या हो सकता है उसे मुझसे प्यार ही न हो
या हो सकता है मुझे अपने काबिल न समझती हो 
शायद इसीलिए उसके दिल में जगह न बना पाया
ये सब बस मेरी एक कल्पना है
सच क्या है ये तो मैं भी नहीं जानता
इसका जवाब तो अभी उसी के पास है
मेरी कल्पना का हकीकत क्या है?
बस यही जानने की आस है
क्योंकि उसकी यादें अब भी मेरे साथ है

मैं तो बस यही चाहता हूँ
कि वो जहाँ भी रहे, जैसी भी रहे
हँसती रहे, मुस्कुराती रहे
अपने मंजिल तक पहुँचे
अगर मुझे वो रुकावट समझती है
तो नहीं बनना रुकावट उसके लिए
लेकिन बस वो "हाँ" तो कर दे
शायद, उसकी सारी समस्याओं का समाधान बन जाऊँ

हो सकता है, मेरा सोचना गलत हो
पर सही क्या है
ये तो वही जाने
बस! एक बार वो मेरी बात तो माने

*राकेश वर्मा*

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